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विलुप्ति से बचाना होगा बाघ को

प्रत्यूष शर्मा

हर साल 29 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस मनाया जाता है। बाघ रॉयल प्रजाति है और विभिन्न संस्कृतियों जैसे हिंदू और बौद्ध धर्म में पूजनीय है। ये पर्यावरण पर्यटन के माध्यम से राजस्व उत्पन्न करने में भी मदद करते हैं। अवैध शिकार, अवैध व्यापार और आवास के नुकसान के कारण बाघों की संख्या में लगातार गिरावट आ रही है। बाघ को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 की पहली अनुसूची, अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ की लाल सूची (रेड लिस्ट) में ‘विलुप्त होने के कगार पर रखा गया है और वन्य जीवों एवं वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर अभिसमय (साइट्स) के पहले परिशिष्ट में रखा गया है।

बाघों की घटती आबादी के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए वर्ष 2010 में रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में हुए सम्मेलन में भारत समेत 13 देशों ने हिस्सा लिया था और यह घोषणा की थी कि बाघ-आबादी वाले देश वर्ष 2022 तक बाघों की आबादी को लगभग दोगुना करने का प्रयास करेंगे। पिछले कुछ वर्षो में बाघों और उनके निवास के आसपास रहने वाले लोगों के बीच टकराव की संख्या में वृद्धि हुई है। इसको रोकने के लिए गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है। बाघ संरक्षण के लिए हमारे समक्ष कई चुनौतियां हैं। कुछ लोग बाघों का शिकार पैसे कमाने के उद्देश्य से करते हैं। विश्व भर में बाघों के प्राकृतिक निवास स्थान का लगभग तिरानवे प्रतिशत हिस्सा नष्ट हो गया है।

इन निवास स्थानों को ज्यादातर मानव गतिविधियों द्वारा नष्ट किया गया है क्योंकि वनों और घास के मैदानों को कृषि जरूरतों के लिए उपयोग किया जा रहा है। बाघों के प्राकृतिक निवास और शिकार स्थान छोटे होने के कारण कई बार बाघ, पालतू पशुओं को अपना शिकार बना लेते हैं और लोग अक्सर जवाबी कार्रवाई करते हुए बाघों को मार देते हैं। बाघों के संरक्षण के लिए भारत सरकार द्वारा कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। वर्ष 1973 में सरकार ने बाघ को भारत का राष्ट्रीय पशु घोषित किया। केंद्र प्रायोजित ‘प्रोजेक्ट टाइगर योजना वर्ष 1973 में शुरू की गई, जिसका उद्देश्य देश के राष्ट्रीय उद्यानों में बाघों को आश्रय प्रदान करना है। जब प्रोजेक्ट टाइगर शुरू हुआ, तो हमारे पास नौ बाघ अभयारण्य थे। आज हमारे पास 53 बाघ अभयारण्य हैं। उत्तर प्रदेश का रानीपुर 53वां बाघ अभयारण्य बनाया गया है।

वर्ष 2023 में प्रोजेक्ट टाइगर के 50 पूरे हो गए हैं। वर्ष 2005 में टाइगर टास्क फोर्स की सिफारिशों के बाद पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत ‘राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण नामक एक वैधानिक निकाय की स्थापना की गई, जो वर्ष 2006 में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम,1972 के प्रावधानों में संशोधन करके की गई थी। विश्व वन्यजीव कोष के अनुसार, बीसवीं सदी की शुरुआत से ही अवैध शिकार जैसी गतिविधियों में बाघों की पंद्रह प्रतिशत आबादी विलुप्त हो गई थी। देश में प्रत्येक चार वर्ष में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण द्वारा पूरे भारत में विभिन्न राज्यों के वन विभागों और भारतीय वन्यजीव संस्थान के साथ साझेदारी में बाघों की गणना की जाती है। वर्ष 2018 में 2967 बाघों के साथ ही भारत ने बाघों की संख्या को दोगुना करने के लक्ष्य को चार वर्ष पूर्व ही प्राप्त कर लिया। भारत दुनिया के 70 फीसद से अधिक बाघों का घर है। एम-स्ट्रिप (मोनिटिरंग सिस्टम फॉर टाइगर्स इंटेसिव-प्रोटेक्शन एंड इकोलॉजिकल स्टेटस) एप्लिकेशन का उपयोग करके पांचवें चक्र की बाघों की गिनती वर्ष 2022 में की गई थी। वर्ष 2022 में बाघों की संख्या बढ़कर 3167 हो गई है।

वर्ष 2016 में भारत और बांग्लादेश ने साझा प्रयास से एक रिपोर्ट जारी की जिसमें  कहा गया था कि सुंदरबन में बढ़ते समुद्री स्तर के कारण 96 फीसद जमीन के डूबने का खतरा बना हुआ है। समुद्री जलस्तर बढ़ने से बाघ आबादी वाले इलाकों की तरफ कूच करेंगे, जिससे मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष की स्थिति पैदा हो सकती है। कई टाइगर रिजवरे में अवैध शिकार रोधी अभियानों के लिए विशेष बाघ सरंक्षण बल तैनात किए गए हैं। ई-र्वड परियोजना के तहत बाघों के संरक्षण हेतु उनकी रखवाली और निगरानी की जा रही है। इस कार्य के लिए मानव रहित हवाई वाहनों जैसी उन्नत तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। हमें बाघों को विलुप्त होने से बचाना होगा। हमारा प्राथमिक लक्ष्य बाघों के प्राकृतिक आवासों की रक्षा के लिए एक वैिक प्रणाली को बढ़ावा देना और बाघ संरक्षण के मुद्दों के लिए जन जागरूकता और समर्थन बढ़ाना है। जहां संभव हो, स्थानीय समुदाय-आधारित संगठनों के साथ भागीदारी को मजबूत किया जाना चाहिए ताकि संघर्ष की स्थितियों को कम करने के साथ संरक्षण योजना और प्रयासों में भागीदारी को और ज्यादा बढ़ाया जा सके।

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